Ramban-Reasi Cloudburst News: जम्मू-कश्मीर इस समय प्राकृतिक आपदा की गंभीर मार झेल रहा है। पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही मूसलाधार बारिश ने स्थिति को बेहद नाजुक बना दिया है। रियासी और रामबन जिलों में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। जहां रियासी जिले के माहौर इलाके में भूस्खलन से सात लोगों की जान चली गई, वहीं रामबन जिले के राजगढ़ क्षेत्र में बादल फटने की घटना ने चार लोगों की जिंदगी छीन ली। इन दोनों जिलों में कई लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं और बचाव कार्य जारी है।
अचानक आई तबाही से हड़कंप
रियासी और रामबन के गांवों में सोमवार देर रात से शुरू हुई तेज बारिश ने तबाही मचा दी। रामबन के राजगढ़ गांव में पहाड़ों से अचानक आया पानी और मलबा देखते ही देखते बाढ़ का रूप ले बैठा। कई घर बह गए, खेत खलिहान जलमग्न हो गए और लोग जैसे-तैसे अपनी जान बचाकर सुरक्षित जगहों की ओर भागे। इस हादसे में चार लोगों की मौत हो चुकी है और चार अन्य के लापता होने की पुष्टि की गई है।
वहीं, रियासी के माहौर डब्बर गांव में पहाड़ खिसकने से कई मकान और झोपड़ियां मलबे में दब गईं। प्रशासन के अनुसार अब तक सात शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि कुछ और लोगों के दबे होने की आशंका है। प्रभावित गांवों में अफरा-तफरी का माहौल है और लोग अपने परिवार को लेकर अस्थायी राहत शिविरों में शरण ले रहे हैं।
बारिश से टूटी जीवनरेखा
भारी बारिश ने इन जिलों की जीवनरेखा ही तोड़ दी है। कई सड़कों पर भूस्खलन के कारण यातायात बंद हो गया है, पुल बह गए हैं और नदी-नालों का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। गांवों का आपसी संपर्क टूटने से राहत और बचाव कार्य में भारी कठिनाई आ रही है। रामबन और रियासी के कई इलाकों में बिजली और मोबाइल नेटवर्क भी प्रभावित है, जिससे लोगों का बाहर की दुनिया से संपर्क लगभग खत्म हो गया है।
राहत-बचाव कार्य में जुटा प्रशासन
इस आपदा के बाद प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, पुलिस और सेना की टीमें मौके पर पहुंच गई हैं। मलबे में दबे लोगों को निकालने के लिए जेसीबी मशीनें और अन्य उपकरण लगाए गए हैं। हालांकि लगातार हो रही बारिश और टूटे रास्तों के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन की रफ्तार धीमी पड़ रही है। प्रभावित परिवारों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाने के लिए अस्थायी शिविर बनाए गए हैं, जहां भोजन और दवाइयों की व्यवस्था की जा रही है।
अधिकारियों ने लोगों से अपील की है कि वे नदियों और भूस्खलन संभावित इलाकों के पास न जाएं। साथ ही गांव-गांव में लाउडस्पीकर और प्रशासनिक अधिकारियों के जरिए चेतावनियां दी जा रही हैं ताकि किसी तरह की और जनहानि से बचा जा सके।
अगस्त में लगातार आपदाओं का सिलसिला
जम्मू-कश्मीर में यह पहली बार नहीं है जब इतनी बड़ी तबाही देखने को मिली हो। अगस्त 2025 के इस महीने में अब तक कई जिलों में भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं हो चुकी हैं। जम्मू, सांबा, कठुआ, रियासी और डोडा जिलों में आई बाढ़ और भूस्खलनों से अब तक 36 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। सिर्फ रियासी और डोडा में ही नौ लोगों की जान गई।
सबसे भयावह घटना 14 अगस्त को किश्तवाड़ जिले के चिशोटी गांव में हुई थी, जहां बादल फटने से कम से कम 60 लोगों की जान चली गई। श्रद्धालुओं के कैंप और कई मकान बह गए। यह इलाका माता वैष्णो देवी यात्रा मार्ग पर पड़ता है, इसलिए वहां का मंजर और भी खौफनाक रहा।
क्यों होती हैं ऐसी घटनाएं?
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, किसी छोटे से क्षेत्र (20–30 वर्ग किलोमीटर) में एक घंटे के भीतर 10 सेंटीमीटर या उससे अधिक बारिश को क्लाउडबर्स्ट कहा जाता है। यह घटना अक्सर पहाड़ी इलाकों में होती है। जब मॉनसून की नमी भरी हवाएं पहाड़ों से टकराकर ऊपर उठती हैं तो वे ठंडी होकर घने बादल बना देती हैं। इन बादलों में जब पानी का दबाव बढ़ जाता है तो अचानक मूसलाधार बारिश होती है। मिनटों में इतना पानी गिरता है कि नदी-नाले उफान पर आ जाते हैं और बाढ़, भूस्खलन जैसी तबाही मचा देते हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन की वजह से क्लाउडबर्स्ट जैसी घटनाओं में तेजी आई है। बढ़ते तापमान से हवा में नमी ज्यादा हो रही है, जिसके कारण बादलों में असामान्य रूप से पानी इकट्ठा होता है और अचानक बारिश के रूप में गिरता है।
लोगों के सामने बढ़ी मुश्किलें
इन घटनाओं ने सैकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया है। खेत-खलिहान और पशुधन के नुकसान से ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति और खराब हो गई है। स्कूल, अस्पताल और कई सरकारी इमारतें भी जलमग्न हो गई हैं। फिलहाल लोग राहत शिविरों में ठहरे हुए हैं, लेकिन लगातार हो रही बारिश ने भय का माहौल बना रखा है।
जम्मू-कश्मीर इन दिनों जलवायु परिवर्तन की मार और प्राकृतिक आपदाओं की लगातार चपेट में है। रियासी और रामबन की घटनाओं ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि पहाड़ी राज्यों में क्लाउडबर्स्ट और भूस्खलन कितना विनाशकारी रूप ले सकते हैं। प्रशासन और राहत टीमें लगातार काम कर रही हैं, लेकिन लोगों की पीड़ा कम होना आसान नहीं है। आने वाले दिनों में बारिश और बढ़ सकती है, ऐसे में सतर्कता और सुरक्षा ही फिलहाल सबसे बड़ा सहारा है।






