नेशनल डेस्क: नेपाल की राजनीति में एक नया इतिहास रचा गया है। सोशल मीडिया बैन के खिलाफ भड़की युवाओं की नाराज़गी ने भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर बड़े पैमाने पर आंदोलन खड़ा कर दिया, जो अंततः सत्ता परिवर्तन में बदल गया। इस जन-आक्रोश के बाद नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री सुशीला कार्की के रूप में नेतृत्व में आयी। सुप्रीम कोर्ट की पूर्व चीफ जस्टिस रह चुकीं कार्की का चयन नेपाल के लिए एक नई शुरुआत का संकेत माना जा रहा है।
हालात सामान्य करने की पहली चुनौती
काठमांडू और कई शहरों में हुई हिंसा और कर्फ्यू के बाद अब स्थिति धीरे-धीरे नियंत्रण में है। सेना और पुलिस अभी भी चौकसी में तैनात हैं, लेकिन प्रशासन का मानना है कि हालात स्थिर होने पर प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाएगा। कार्की के लिए पहला काम यही होगा कि वे शांति और भरोसे का माहौल बनाएं ताकि लोग दोबारा सामान्य जीवन की ओर लौट सकें।
भ्रष्टाचार और बेरोजगारी पर कड़ा एक्शन
नेपाल के युवाओं का गुस्सा जिस वजह से सड़कों पर फूटा, वह है भ्रष्टाचार और रोजगार की कमी। कार्की को सरकार की नियुक्तियों, ठेकों और बजट खर्च में पारदर्शिता लाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। विशेषज्ञ मानते हैं कि स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन, स्किल डेवलपमेंट प्रोग्राम और निजी निवेश आकर्षित करने की नीतियां उनके एजेंडे में होनी चाहिए। अगर वे शुरुआती छह महीनों में कुछ ठोस फैसले ले पाती हैं, तो जनता का भरोसा चुनाव तक बनाए रखना आसान होगा।
युवाओं से संवाद की ज़रूरत
यह आंदोलन पूरी तरह Gen-Z की अगुवाई में हुआ है। यही वह वर्ग है जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और नीतियों पर खुलकर सवाल करता है। कार्की के सामने बड़ी चुनौती होगी कि वे इस युवा वर्ग के साथ संवाद कायम रखें और उन्हें सुधारों की प्रक्रिया में भागीदार बनाएं।
भारत के साथ रिश्ते सुधारने की पहल
शपथ ग्रहण के बाद कार्की का भारत को लेकर भावुक संदेश सुर्खियों में रहा। उन्होंने कहा कि “भारत में दर्द होता है, तो आंसू हमारे भी आते हैं।” उनका यह बयान सीमा विवाद और कूटनीतिक तनाव के बाद रिश्तों में नई शुरुआत का संकेत देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और नेपाल में स्थिरता की कामना की। यह संकेत है कि आने वाले समय में दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने की कोशिश होगी।
चीन की चुप्पी और विदेश नीति का संतुलन
भारत की सकारात्मक प्रतिक्रिया के विपरीत चीन अब तक चुप है। बीजिंग नेपाल में सड़क, रेल और ऊर्जा परियोजनाओं में बड़ा निवेश कर चुका है, इसलिए उसका अगला कदम महत्वपूर्ण होगा। कार्की के सामने चुनौती होगी कि वे भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलें ताकि नेपाल के आर्थिक हित प्रभावित न हों।
आंतरिक राजनीति का दबाव
अंतरिम सरकार में कई नए चेहरे हैं, जिनमें ऊर्जा विशेषज्ञ कुलमान घिसिंग और समाजसेवी-राजनीतिज्ञ सुदन गुरूंग शामिल हैं। इन नेताओं की महत्वाकांक्षाएं आने वाले दिनों में सहयोग भी दे सकती हैं और दबाव भी बना सकती हैं। कार्की को गठबंधन के भीतर तालमेल बनाए रखना होगा ताकि सुधारों की रफ्तार धीमी न पड़े।
आगे की राह
सुशीला कार्की का प्रधानमंत्री बनना नेपाल के लिए सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि नई राजनीतिक सोच का प्रतीक है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि वे छह महीने के अंतरिम कार्यकाल में कितनी दूर तक सुधार लागू कर पाती हैं। असली परीक्षा तब होगी जब चुनाव नजदीक आएंगे और जनता इस नई सरकार का हिसाब मांगेगी।
नेपाल ने एक नया पन्ना खोल दिया है, लेकिन यह कहानी किस दिशा में जाएगी, यह आने वाले महीनों और कार्की की नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करेगा।
Gen-Z क्रांति के बाद नेपाल की पहली महिला प्रधानमंत्री चुनी गई सुशीला कार्की, भारत-चीन संतुलन और भ्रष्टाचार-बेरोजगारी से निपटने की है असली चुनौती







