सुशीला कार्की ने संभाली नेपाल की कमान, राजनीतिक उथल-पुथल, सोशल मीडिया बैन और जेन-जेड प्रोटेस्ट के बीच बनीं पहली महिला पीएम

Nepal First Woman Prime Minister सुशीला कार्की की शपथ ने नेपाल को नई दिशा दी।

नेशनल डेस्क: नेपाल में एक ऐतिहासिक पल दर्ज हुआ है। देश की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की ने शुक्रवार को अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। यह कदम सिर्फ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि एक नए युग की शुरुआत माना जा रहा है। कार्की न केवल नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश रही हैं, बल्कि अब देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने एक और इतिहास रच दिया है।

राजनीतिक संकट के बीच नई उम्मीद

पिछले कई दिनों से नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता चरम पर थी। भ्रष्टाचार, सरकारी पक्षपात और सोशल मीडिया बैन को लेकर युवाओं ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू किए थे। 8 सितंबर से चले इस आंदोलन में हिंसा भड़कने के बाद हालात बिगड़ते गए और कम से कम 51 लोगों की मौत हो गई। बढ़ते दबाव और जनाक्रोश के बीच प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस राजनीतिक संकट के बीच सभी दलों की सहमति से कार्की को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया है।

अनुच्छेद 61 के तहत हुई नियुक्ति

यह नियुक्ति इसलिए भी खास है क्योंकि 2015 में संविधान लागू होने के बाद पहली बार किसी प्रधानमंत्री की नियुक्ति अनुच्छेद 61 के तहत की गई है। इससे पहले सभी सरकारें अनुच्छेद 76 के तहत बनती रही थीं। राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने शीतल निवास में आयोजित समारोह में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। राष्ट्रपति कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि नई अंतरिम सरकार को छह महीने के भीतर आम चुनाव कराने होंगे।

कार्की की साफ-सुथरी छवि बनी ताकत

सुशीला कार्की का नाम इसलिए चुना गया क्योंकि उनकी छवि ईमानदार और पारदर्शी मानी जाती है। मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ कई सख्त फैसले दिए थे और न्यायपालिका की साख को मजबूत किया था। यही कारण है कि युवा आंदोलन का नेतृत्व कर रही जेन-जेड कमेटी ने उन्हें अंतरिम प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ाया।

जेन-जेड का राजनीतिक दबाव

इस आंदोलन की सबसे खास बात यह रही कि इसे नेतृत्व देने वाली जेन-जेड कमेटी ने राजनीति में सीधे प्रवेश करने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि वे सरकार पर जनता की तरह निगरानी रखेंगे और प्रहरी की भूमिका निभाएंगे। इसका मतलब है कि कार्की की सरकार पर युवाओं का दबाव बना रहेगा ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही कायम रहे।

ओली गुट का विरोध जारी

हालांकि कार्की की नियुक्ति को स्थिरता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री ओली की पार्टी ने संसद भंग करने के फैसले का विरोध किया है। पार्टी महासचिव शंकर पोखरेल ने इसे लोकतंत्र के लिए खतरा बताया और कार्यकर्ताओं से सड़कों पर उतरने की अपील की है। यह साफ है कि आने वाले समय में राजनीतिक हलचल पूरी तरह थमी नहीं है।

कार्की के सामने बड़ी चुनौतियाँ

सुशीला कार्की के सामने अब सबसे बड़ा काम राजनीतिक स्थिरता बहाल करना और चुनाव की दिशा में कदम बढ़ाना है। उन्हें हिंसा और अविश्वास के माहौल को खत्म कर जनता में भरोसा जगाना होगा। सोशल मीडिया बैन हटाने और भ्रष्टाचार पर काबू पाने जैसे मुद्दों पर जल्द कदम उठाना उनकी प्राथमिकता होगी। साथ ही, उन्हें विपक्ष और आंदोलनकारी युवाओं के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा।

महिलाओं के लिए नई प्रेरणा

कार्की का प्रधानमंत्री बनना नेपाल में महिला नेतृत्व के लिए नई प्रेरणा है। यह साबित करता है कि न्यायपालिका और राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अब मजबूती से सामने आ रही है। यह कदम दक्षिण एशिया में लैंगिक समानता की दिशा में भी सकारात्मक संकेत देता है।

सुशीला कार्की की शपथ न सिर्फ राजनीतिक बदलाव है बल्कि नेपाल के लोकतंत्र के लिए नई उम्मीद भी है। उनकी ईमानदार छवि और सख्त फैसलों का अनुभव उन्हें इस कठिन समय में मजबूत नेतृत्व देने में मदद कर सकता है। आने वाले छह महीने यह तय करेंगे कि क्या वे नेपाल को स्थिरता और पारदर्शी शासन की दिशा में आगे ले जा पाती हैं।

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