नेशनल डेस्क: देश में उपराष्ट्रपति पद के लिए होने वाले चुनाव की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। 9 सितंबर को सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक संसद भवन में मतदान होगा और उसी दिन शाम छह बजे से मतगणना की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। देर रात तक यह साफ हो जाएगा कि देश का नया उपराष्ट्रपति कौन होगा। इस बार का चुनाव इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि मैदान में एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ने दक्षिण भारत से उम्मीदवार उतारे हैं। एनडीए की ओर से महाराष्ट्र के राज्यपाल और भाजपा नेता सी.पी. राधाकृष्णन उम्मीदवार हैं, जबकि विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बी. सुदर्शन रेड्डी पर दांव लगाया है।
एनडीए का पलड़ा भारी
इस चुनावी जंग में जीत का आंकड़ा 391 वोट है। वर्तमान में संसद के दोनों सदनों में कुल 781 सदस्य मतदान के पात्र हैं। मौजूदा समीकरणों पर नजर डालें तो एनडीए के पास करीब 425 सांसदों का समर्थन पहले से ही मौजूद है। यानी उसके पास जीत की स्थिति मजबूत है। दूसरी ओर विपक्ष के पास लगभग 324 सांसद हैं। ऐसे में हार-जीत का अंतर भले ही विपक्ष को छोटा दिखाने की उम्मीद हो, लेकिन सत्ता पक्ष की बढ़त को नकारा नहीं जा सकता।
वाईएसआरसीपी ने किया समर्थन का ऐलान
आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह एनडीए उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करेगी। इसके सात राज्यसभा और चार लोकसभा सांसद हैं, जो एनडीए के आंकड़े को और मजबूत बना देते हैं। मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी पहले भी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा के साथ खड़े रहे हैं। राज्य को विशेष पैकेज और केंद्र से आर्थिक सहयोग उनकी राजनीति का अहम हिस्सा रहा है। इस बार भी उनका रुख बिल्कुल स्पष्ट है और किसी तरह का भ्रम नहीं है।
बीजेडी का फैसला होगा निर्णायक
ओडिशा की बीजू जनता दल (बीजेडी) अक्सर ऐसे मौकों पर अपने फैसलों से सुर्खियों में रहती है। राज्यसभा में बीजेडी के सात सांसद हैं और यह संख्या किसी भी पक्ष की ताकत बढ़ा सकती है। नवीन पटनायक की राजनीति ज्यादातर इश्यू-आधारित समर्थन पर आधारित रही है। केंद्र सरकार से सहयोग लेकर ओडिशा को फायदा पहुंचाने की रणनीति ही बीजेडी को विपक्ष से दूरी बनाए रखने के लिए प्रेरित करती है। संभावना है कि इस बार भी पार्टी एनडीए को समर्थन देकर सत्ता पक्ष के साथ रिश्ते संतुलित रखना चाहेगी। यही वजह है कि विपक्ष को बीजेडी से मदद मिलने की संभावना बेहद कम है।
बीआरएस की मुश्किलें
तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने अब तक स्पष्ट रूप से अपना रुख सामने नहीं रखा है। लेकिन राजनीतिक संकेत बता रहे हैं कि पार्टी मतदान से दूरी बना सकती है। कारण है आगामी जुबली हिल्स विधानसभा उपचुनाव, जहां मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं। यदि बीआरएस खुलकर एनडीए का साथ देती है तो उसे स्थानीय स्तर पर नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसलिए संभावना यही है कि पार्टी मतदान से अनुपस्थित रहकर खुद को तटस्थ स्थिति में दिखाए।
निर्दलीय और छोटे दल भी अहम
इस चुनाव में सात निर्दलीय सांसद भी वोट डालेंगे। इनमें से तीन का रुख अब तक साफ नहीं हो सका है। इसके अलावा अकाली दल, जेडपीएम और वीओटीटीपी जैसे दलों के एक-एक सांसद हैं। संख्या कम होने के बावजूद ये वोट नतीजों पर असर डाल सकते हैं, खासकर तब जब मुकाबला नजदीकी हो। एनडीए इन सांसदों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहा है, वहीं विपक्ष भी उन्हें साधने में जुटा है।
विपक्ष की चुनौती
विपक्ष ने अपने उम्मीदवार के रूप में न्यायमूर्ति बी. सुदर्शन रेड्डी को उतारकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि यह चुनाव सिर्फ संख्या का नहीं बल्कि वैचारिक लड़ाई का भी है। विपक्ष का दावा है कि हार का अंतर बड़ा नहीं रहेगा। हालांकि, गठबंधन की तैयारी और रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं। राहुल गांधी की विदेश यात्रा और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सीमित सक्रियता ने विपक्षी खेमे को कमजोर स्थिति में ला दिया है। विपक्ष की एकजुटता पर भी सवाल उठे हैं, जिससे यह संदेश जा रहा है कि क्षेत्रीय दल सत्ता पक्ष की ओर झुक सकते हैं।
संभावित नतीजे
वर्तमान गणित देखें तो एनडीए की स्थिति काफी मजबूत है। वाईएसआरसीपी और बीजेडी का समर्थन मिलने के बाद सत्ता पक्ष का आंकड़ा 430 से ऊपर पहुंच सकता है। विपक्ष चाहे कितना भी प्रयास करे, इतने वोटों के अंतर को पाटना आसान नहीं होगा। बीआरएस के तटस्थ रहने से विपक्ष को कोई विशेष फायदा मिलने की संभावना भी नहीं दिखती।
हालांकि, गुप्त मतदान होने के कारण क्रॉस वोटिंग की संभावना हमेशा बनी रहती है। यही कारण है कि एनडीए और इंडिया गठबंधन दोनों ही अपने सांसदों को विशेष रूप से सावधान कर रहे हैं।
9 सितंबर को होने वाला उपराष्ट्रपति चुनाव नतीजों के लिहाज से भले ही बहुत बड़ा रोमांच न दिखाए, लेकिन इसमें क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। वाईएसआरसीपी और बीजेडी जैसे दलों ने साफ कर दिया है कि उनका झुकाव सत्ता पक्ष की ओर है। बीआरएस तटस्थ रह सकती है और कुछ छोटे दल आखिरी वक्त में अपना रुख तय करेंगे। ऐसे में यह चुनाव न केवल एनडीए की जीत सुनिश्चित करने वाला साबित होगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दल किस तरह राष्ट्रीय समीकरणों को प्रभावित करते हैं।






