जाति-आधारित राजनीति पर योगी सरकार का वार, UP में जाति लिखने और रैलियों पर बैन, विपक्ष ने साधा निशाना

Yogi government order Yogi government order: यूपी में caste rally ban और जाति नाम पर रोक से सियासत गरमाई।

नेशनल डेस्क: उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जाति के नाम पर होने वाली राजनीति और रैलियों पर पूरी तरह रोक लगा दी है। यह फैसला आते ही विपक्ष ने सरकार को घेरने का काम शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सरकार पर तंज कसते हुए पूछा कि केवल कागजों और सभाओं से जाति हटाने से सदियों पुरानी मानसिकता कैसे बदलेगी? वहीं बसपा समेत अन्य छोटे दलों को भी यह आदेश अपने वोट बैंक पर सीधा असर करता हुआ नजर आ रहा है।

पुलिस रिकॉर्ड में बड़ा बदलाव

सरकार के आदेश के बाद पुलिस दस्तावेजों में अब किसी भी आरोपी, गवाह या मुखबिर की जाति नहीं लिखी जाएगी। एफआईआर, गिरफ्तारी मेमो और चार्जशीट में केवल माता और पिता का नाम दर्ज होगा। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) को भी ऑनलाइन सिस्टम से जाति वाला कॉलम हटाने का निर्देश दिया गया है ताकि अपराध दर्ज करने की प्रक्रिया में जातिगत पहचान का कोई महत्व न रहे।

सार्वजनिक स्थलों से हटेंगे जातीय प्रतीक

थानों, नोटिस बोर्ड और साइनबोर्ड से जाति से जुड़े नारे, प्रतीक और स्टिकर हटाए जाएंगे। यहां तक कि गाड़ियों पर जाति का नाम लिखना या उसका महिमामंडन करने वाले स्टिकर लगाना अब गैरकानूनी होगा। इस आदेश के क्रियान्वयन के लिए पुलिस नियमावली और SOP में बदलाव किए जाएंगे ताकि इसे सख्ती से लागू कराया जा सके।

सोशल मीडिया पर भी शिकंजा

सरकार ने साफ कर दिया है कि यह आदेश डिजिटल दुनिया पर भी लागू होगा। सोशल मीडिया पर जाति विशेष का महिमामंडन, नफरत फैलाने वाले पोस्ट या उकसाने वाली टिप्पणियां आईटी एक्ट के तहत कार्रवाई के दायरे में आएंगी। अधिकारियों का मानना है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर बढ़ती जातीय राजनीति को रोकना समय की जरूरत है।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेश के बाद लिया गया है। कोर्ट ने साफ कहा था कि जातिगत महिमामंडन राष्ट्र-विरोधी है और यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। जस्टिस विनोद दिवाकर की टिप्पणी थी कि यदि भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाना है, तो समाज से जातिवाद की जकड़न खत्म करना आवश्यक है। कोर्ट ने आदेश दिया था कि पुलिस दस्तावेजों, सरकारी रिकॉर्ड और सार्वजनिक जगहों से जाति से जुड़ी पहचान को हटाया जाए।

विपक्ष के सवाल

फैसले के तुरंत बाद विपक्ष ने सरकार पर हमला बोल दिया। अखिलेश यादव ने कहा कि जाति का जिक्र मिटा देने से जातिगत भेदभाव की मानसिकता खत्म नहीं होगी। उन्होंने पूछा कि नाम सुनकर जाति पूछने की आदत, झूठे आरोप लगाकर बदनाम करने की प्रवृत्ति और सामाजिक भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है। बसपा और अन्य दलों ने भी इसे अपने जनाधार पर प्रहार बताते हुए विरोध दर्ज कराया।

राजनीति पर असर

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला उत्तर प्रदेश की राजनीति को नई दिशा देगा। सपा, बसपा, निषाद पार्टी और अपना दल जैसी पार्टियां लंबे समय से जाति-आधारित रैलियों और सभाओं पर अपनी पकड़ बनाए रखती थीं। अब इन गतिविधियों पर रोक लगने से चुनावी रणनीतियों पर असर पड़ना तय है। दूसरी ओर भाजपा इस कदम को सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता की दिशा में बड़ा कदम बताकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगी।

नई सोच की शुरुआत

योगी सरकार का यह आदेश केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि समाज में नई सोच को जन्म देने की कोशिश है। सरकार का मानना है कि जब तक जाति का महिमामंडन बंद नहीं होगा, तब तक समानता की भावना मजबूत नहीं हो सकती।
मुख्य सचिव ने साफ कर दिया है कि आदेश के पालन में किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जिलाधिकारियों और पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि उल्लंघन की स्थिति में तुरंत कार्रवाई हो। अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि यह आदेश कितनी सख्ती से लागू होता है और क्या यह वाकई जातिवाद को कम करने में सफल हो पाता है।

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